Savitri Era of those who adore, Om Sri Aurobindo and The Mother.

Thursday, January 19, 2012

Ramesh Bijlani | speakingtree.in

Ramesh Bijlani's Profile | speakingtree.in: 'via Blog this' Jan 15, 2012 at 08:25 pm
Ramesh Bijlani has created a blog Obsessive Compulsive Spirituality
Don’t speak. Act. Don’t Announce. Realise. THE MOTHER

Among the visitors to spiritual organizations like Sri Aurobindo Ashram are some dead serious, sincere and intense young people who claim to be on the spiritual path but seem to be on the verge of losing their mental balance, if they have not lost it already. The question naturally arises what makes something as laudable as the spiritual path a risky road to walk on. The risk lies in a faulty approach to spirituality. Young people who become miserable as a result of their engagement with spirituality invariably treat spirituality as yet another worldly achievement. They go about searching for techniques that would take them to the peak by the easiest, shortest and fastest route. They treat spirituality like mountaineering. They want to climb nothing less than the Everest, and feel entitled to do so because they are ready to spend all their energy looking for and learning the best techniques. They may try several techniques simultaneously, or in quick succession, with great vigour. They may go straightaway to the advanced pranayamas, or meditate for hours or days at a stretch under the mistaken impression that if something is good, more of it should be better. Then they start looking for signs of progress. So obsessed are they with getting there as quickly as possible that they attach great importance to their ‘visions’, ‘dreams’ and ‘experiences’. They try to hold on to these real or imagined events, try to repeat them, improve upon them, and talk about them, either to seek approval and confirmation, or to impress people. But instead of getting the peace that may be expected on the spiritual path, they get only more and more disturbed. Unless they correct the fatal flaw in their approach to spirituality, they end up on the psychiatrist’s couch.

In order to understand how the approach of these sincere but misguided young people to spirituality is flawed, let us digress to an ordinary young person. He wants wealth, power, and prestige. In the pursuit of what he wants, he becomes completely absorbed in himself. Our young man on the spiritual path wants to reach spiritual heights. In the pursuit of what he wants, he also becomes completely absorbed in himself. Hence there is no fundamental difference between these two young men. They both want something badly. They are both afflicted with acute self-absorption. The desire in both cases is intense, and the impatience of the seeker is palpable. The difference lies only in what they want. In a sense, our spiritual enthusiast is the worse of the two. The seeker of wealth, name and fame may at least temper his pursuit because of ethical considerations and out of decency. But the one wanting spiritual victory may be blatantly egoistic because he does not feel any scruples are necessary in pursuing the noblest of goals. The result is that spiritual enthusiasts frequently find themselves entangled in one or more of the following deadly traps.


जैसे श्री अरबिंदो आश्रम आध्यात्मिक संगठनों के लिए आगंतुकों के अलावा कुछ मृत गंभीर, ईमानदार, और तीव्र युवा लोग हैं, जो आध्यात्मिक पथ पर होने का दावा है, लेकिन अपने मानसिक संतुलन खोने के कगार पर हो सकता है, अगर वे इसे नहीं पहले से ही खो दिया है लग रहे हैं. प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है क्या कुछ के रूप में आध्यात्मिक पथ करने के लिए एक जोखिम भरा सड़क पर चलने के रूप में प्रशंसनीय बनाता है. जोखिम आध्यात्मिकता के लिए एक दोषपूर्ण दृष्टिकोण में निहित है. युवा लोग हैं, जो आध्यात्मिकता के साथ उनकी सगाई का एक परिणाम के के रूप में दुखी हो जाते हैं हमेशा अभी तक एक सांसारिक उपलब्धि के रूप में आध्यात्मिकता का इलाज. वे के बारे में तकनीक है कि उन्हें आसान, कम से कम और सबसे तेजी से मार्ग द्वारा पीक करने के लिए ले जाएगा के लिए खोज जाओ. वे पर्वतारोहण की तरह आध्यात्मिकता का इलाज. वे एवरेस्ट से कम कुछ भी नहीं चढ़ाई करना चाहते हैं, और लगता है कि ऐसा करने के हकदार है क्योंकि वे अपने सभी ऊर्जा के लिए देख रहे हैं और बेहतरीन तकनीक सीखने खर्च करने को तैयार हैं. वे महान उत्साह के साथ एक साथ, या जल्दी उत्तराधिकार में कई तकनीकों की कोशिश कर सकते हैं. वे सीधे उन्नत प्राणायाम, या हो सकता है गलत धारणा है कि अगर कुछ अच्छा है, इसे और अधिक बेहतर किया जाना चाहिए के तहत एक खंड में घंटे या दिन के लिए ध्यान. तब वे प्रगति के संकेत के लिए तलाश शुरू करते हैं. तो पागल वे कर रहे हैं वहाँ के रूप में जल्दी हो रही है के रूप में संभव के साथ है कि वे उनके 'दर्शन' को काफी महत्व देते हैं, 'सपने' और 'अनुभवों'. वे इन असली या कल्पना की घटनाओं पर पकड़ की कोशिश करते हैं, उन्हें दोहराने के लिए, उन पर सुधार करने के लिए, और उनके बारे में बात करने के लिए, या तो अनुमोदन और पुष्टि की तलाश के लिए, या लोगों को प्रभावित करने की कोशिश. लेकिन शांति है कि आध्यात्मिक मार्ग पर उम्मीद की जा सकती हो रही करने के बजाय, वे केवल और अधिक परेशान हो. जब तक वे आध्यात्मिकता के प्रति उनके दृष्टिकोण में घातक दोष सही, वे मनोचिकित्सक सोफे पर खत्म होता है.

आदेश में समझने के लिए कैसे इन ईमानदारी लेकिन गुमराह युवा लोगों की आध्यात्मिकता करने के लिए दृष्टिकोण से दोषपूर्ण है, हमें एक साधारण युवा व्यक्ति के लिए पीछे हटना. वह धन, शक्ति, प्रतिष्ठा, और चाहता है. वह क्या चाहता है की खोज में, वह पूरी तरह खुद में लीन हो जाता है. हमारे आध्यात्मिक पथ पर जवान आदमी को आध्यात्मिक ऊंचाइयों तक पहुँचने के लिए करना चाहता है. वह क्या चाहता है की खोज में, वह भी अपने आप में पूरी तरह से अवशोषित हो जाता है. इसलिए इन दो युवा पुरुषों के बीच कोई बुनियादी फर्क है. वे दोनों बुरी तरह से कुछ करना चाहते हैं. वे दोनों तीव्र आत्म अवशोषण के साथ पीड़ित हैं. दोनों ही मामलों में इच्छा तीव्र है, और साधक की अधीरता साफ नजर आती है. अंतर में वे क्या चाहते हैं ही निहित है. एक मायने में, हमारे आध्यात्मिक उत्साही दो में से भी बदतर है. धन, नाम और प्रसिद्धि के साधक कम से कम नैतिक शालीनता की और विचारों की वजह से उसका पीछा गुस्सा हो सकता है. लेकिन आध्यात्मिक जीत चाहते हैं एक blatantly अहंकारी हो सकता है क्योंकि वह महसूस नहीं करता है किसी भी संदेह लक्ष्यों के noblest पीछा में आवश्यक हो सकता है. नतीजा यह है कि आध्यात्मिक के प्रति उत्साही अक्सर एक या एक से अधिक निम्नलिखित घातक जाल में खुद उलझ पाते.

Friday, November 11, 2011

Tuesday, August 16, 2011

श्रीअरविन्द का योग वैज्ञानिक है


श्री अरविंद एक सिद्धहस्त लेखक थे। उनके लेखन का आरंभ भवानी-भारती, दुर्गा स्तुति तथा वंदेमातरम् से हुआ। ये उनके क्रांतिकारी जीवन की रचनाएं हैं। भारत को स्वतंत्र देखना उनके जीवन का प्रधान उद्देश्य था। अलीपुर जेल से वापस आने के बाद भगवान श्रीकृष्ण ने अब बाहर से नहीं भीतर (अंतरात्मा) से आंदोलन की आज्ञा दी तो वे पांडिचेरी चले गए जहां आजीवन योगी के रूप में प्रतिष्ठित रहे। भारत के स्वतंत्रता के निमित्त सदैव वे यहां से भी प्रयत्नशील रहे।
उनका लेखन अंग्रेजी भाषा में होता था।
दिव्य जीवन, गीता-प्रबंधन तथा श्री मां जैसे ग्रंथों के अतिरिक्त भी उनके अनेक ग्रंथ हैं जिनमें सर्वाधिक महत्व का सावित्री महाकाव्य है। यह उनकी अंतिम तथा समन्वित योग के सार तत्व की रचना है। अंग्रेजी भाषा का यह सबसे विशिष्ट महाकाव्य माना जाता है। अमेरिका में सायराकूसविश्वविद्यालय के प्रोफेसर डा.पाइपर ने इस ग्रंथ के विषय में अपने विचार इस प्रकार व्यक्त किए हैं। इस महाकाव्य ने नवयुग की ज्योति का शुभारंभ कर दिया है। अंग्रेजी भाषा का यह सबसे विशिष्ट महाकाव्य है।
वस्तुत:सावित्री मनुष्य के मन को विस्तृत कर परम स्वयंभू तक ले जाने के लिए सबसे शक्तिशाली कलात्मक रचना है। यह विशाल है, भव्य है तथा इसमें रूपकों का चमत्कार है। मनुष्यों की पीढी दर पीढी इन निरंतर स्रोत से अपनी आत्मा का अमृतपानकरती रहेगी।
इसका कथानक श्री अरविन्द ने महाभारत से लिया तथा सावित्री और सत्यवान की प्रसिद्ध कथा को लेकर मनुष्य की मृत्यु पर विजय दिखाई है। उनके ही शब्दों में-सावित्री सूर्यपुत्री है सर्वोच्च सत्य की देवी है। सावित्री का पिता अश्वपति तपस्या का अधिपति है। सत्यवान का पिता द्युगत्सेनदिव्यमनहै। वस्तुत:यह कथन रूपक मात्र नहीं है। न इसके पात्र ही मानवीय गुणों वाले ही हैं वरन् वे सजीव और चेतन शक्तियों के अवतार और विभूतियां हैं। श्री मां ने सावित्री के विषय में जो कुछ कहा है वह इस प्रकार है-उन्होंने सारे विश्व को एक पुस्तक में उतार लिया है। यह अद्भुत, भव्य और अद्वितीय पूर्णता से भरी हुई रचना है। श्री अरविन्द का योग वैज्ञानिक है। भोग सत्य का एक छोर है तो वैराग्य दूसरा। संपूर्ण सत्य वह है जो दोनों को अपने भीतर समाहित करता है और फिर दोनों से आगे निकल जाता है। सावित्री इसी तथ्य का दिग्दर्शन कराती है। डारविनका विकासवादअधूरा है। क्या प्रकृति अब आगे कोई रचना नहीं करेगी! विकास का रथ रुक जाएगा? नहीं। अब प्रकृति मानव के भीतर अतिमानव की संभावनाएं तलाश रही है। श्री अरविन्द का समन्वित योग मानव को अतिमानव तक पहुंचाना है। इसी के निमित्त उनकी योग साधना थी। अतिमानवीचेतना मनुष्य के मन के भीतर छिपी हुई है। अब वह प्रकट होने के समीप है। मनुष्य अगर साधना पूर्वक उस चेतना को ग्रहण करने का प्रयास करे तो अतिमानसीचेतना अवश्य उत्तीर्ण होगी। प्रकृति के पीछे जो विश्वात्मा विराजमान है उसके साथ अभिन्नतास्थापित कर अनन्त शक्ति से शक्तिमान होना है। मनुष्य के अंदर जो सुप्त देवता विद्यमान है उसको जागृत कर मनुष्य का रूपान्तर साधित करना होगा। पृथ्वी की अन्तर्निहित विराट चेतना को उद्बुद्ध कर यहीं पर स्वर्ग राज्य को स्थापित करना होगा। इस महान ग्रंथ का काव्यानुवादमहान कवयित्री विद्यावती कोकिल ने हिंदी में किया है इसी से यह हमें उपलब्ध है।
डा. सरोजिनी कुलश्रेष्ठ 
महर्षि श्री अरविंद का सावित्री महाकाव्य

श्रीअरविंद के जीवन में अहंकार या अध्ययन नहीं बल्कि भागवत शक्ति ही संचालिका थी

139वें जन्मदिवस (15 अगस्त) पर विशेषः 

... 

भारत गौरव 
रविवार, 14 अगस्त 2011 00:00
देवदत्त

महर्षि अरविन्द घोष की जन्मशताब्दी (15 अगस्त 1972) पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक श्री मा.स. गोलवलकर उपाख्य श्रीगुरुजी ने उनका स्मरण करते हुए अपने संदेश में कहा था ...हमारे राष्ट्र की समस्याओं के सम्यक् बोध और अपनी अंत:स्फूत्र्त भविष्य दृष्टि द्वारा उन्होंने हमें अनुसरण करने के लिए जो निर्देश दिए हैं उनसे हमारा सनातन धर्म, संस्कृति और राष्ट्र अखिल विश्व की मानवता के दीप्तिमंत, पावन और सामथ्र्य संपन्न नेता के रूप में निश्चय फिर खड़ा होगा।

श्रीअरविंद के जीवन में अहंकार या अध्ययन नहीं बल्कि भागवत शक्ति ही संचालिका थी। उनके पिता डा.कृष्णधन घोष ने भारतीयता के स्पर्श से बचाने के लिए बचपन में ही उन्हें लंदन पहुँचा दिया था। वहाँ उन्होंने आई.सी.एस की परीक्षा में प्रथम स्थान तो प्राप्त किया किंतु घुड़सवारी की परीक्षा में नहीं गये। उन्हें भारत माता की सेवा का भागवत-आदेश मिल गया था।
वे स्वदेशी के प्रवर्तक थे। शिक्षा क्षेत्र में वे राष्ट्रीय कालेज के आचार्य के रूप में आए और छात्रों के समक्ष आदर्श रखा कि भारत माता के लिए पढ़ो और तन, मन एवं जीवन को उसकी सेवा के लिए शिक्षित करो। विदेश जाओ ताकि वह विद्या लाओ जिससे भारत मां की सेवा हो, कष्ट सहो ताकि माता प्रसन्न हो।
राजनीति में वे सशस्त्र क्रांति के उद्घोषक थे। ब्रिाटेन में बम बनने के पूर्व ही श्री अरविंद के अनुयायी क्रांतिकारियों ने बम बना लिया था। अलीपुर बम केस मुजफ्फरपुर में जिलाधिकारी किंग्सफोर्ड पर प्रयोग के प्रयास का परिणाम था।
सन् 1896 से 1905 तक उन्होंने बड़ौदा रियासत में राजस्व अधिकारी से लेकर बड़ौदा कालेज के फ्रेंच अध्यापक और उपाचार्य रहने तक रियासत की सेना में क्रांतिकारियों को प्रशिक्षण भी दिलाया था। हजारों युवकों को उन्होंने क्रांति की दीक्षा दी थी। डा. केशव बलिराम हेडगेवार भी उनमें थे।
घुड़सवारी की परीक्षा में न बैठने के कारण वे डरपोक कहे जाते थे, पर वे बड़ौदा नरेश सयाजीराव गायकवाड़ के साथ घुड़सवारी पर जाते थे। एक बार एक वृद्धा ने न पहचानकर महाराज से बोझा उठवाने को कहा था। महाराज बोझा उसके सर पर रखवा ही रहे थे कि श्री अरविंद का घोड़ा आ पहुँचा। श्री अरविंद मुस्कुरा रहे थे। महाराज ने कारण पूछा तो उन्होंने कहा था-व्देख रहा हूँ जिसे प्रभु ने बोझा उतारने का काम दिया है वह बोझा चढ़ा रहा है।
वे निजी रुपये-पैसे का हिसाब नहीं रखते थे। पर राजस्व विभाग में कार्य करते समय उन्होंने जो विश्व की प्रथम आर्थिक विकास योजना बनाई थी उसका कार्यान्वयन करके बड़ौदा राज्य देशी रियासतों में अन्यतम बन गया था। महाराजा मुम्बई की वार्षिक औद्योगिक प्रदर्शनी के उद्घाटन हेतु आमंत्रित किए जाने लगे थे।
बड़ौदा रियासत में दस्तूरी चलती थी। एक बार एक जमींदार के काम को श्री अरविंद ने इनकार कर दिया था। कुछ दिनों बाद उन्हें मेज पर 500 रुपये का लिफाफा मिला। पूछने पर सभी मुस्कुराते थे। अंत में चपरासी ने बताया कि उसी जमींदार की दस्तूरी में से आपका हिस्सा है। श्री अरविंद ने सर सुब्बा (दीवान) से शिकायत की तो वे भी मुस्कुराए और वह कार्य छोड़कर श्री अरविंद बड़ौदा कालेज में फ्रेंच अध्यापक पद पर पहुँच गये।
अध्यापन युग में वे मुम्बई के इन्दु प्रकाश पत्र में ब्रिाटिश शासन के विरुद्ध उग्र लेखों के लिए प्रसिद्ध थे। अचानक बंगाल में क्रांति यज्ञ की ज्वाला को धधकाने के लिए रु.665 मासिक की नौकरी छोड़ दी तो छात्रों ने समझा कि उन्हें और अच्छी नौकरी मिल गयी होगी। उन्होंने श्री अरविंद से पूछा, सर आपने यहाँ पढ़ाना छोड़ दिया?
व्हां संक्षिप्त सा उत्तर था।
सर! वहाँ आपको कितना वेतन मिलेगा?
-एक सौ पचास रुपये।
छात्रों को विश्वास हो गया कि वे पागल हो गये हैं।
वस्तुत: यह किसी संन्यासी का त्याग नहीं था। श्री अरविंद पर धर्मपत्नी मृणालिनी और बहन सरोजिनी का दायित्व भी था। अत: पैसे की जरूरत होने के बावजूद उन्होंने कठिनाई का मार्ग चुना। हालांकि उनके बड़े भाई विनय भूषण कभी कूचबिहार, कभी महिषादल रियासतों के दीवान बनकर राजसी ठाट से रहते थे।
श्री अरविंद कलकत्ता आए तो राजा सुबोध मलिक की अट्टालिका में ठहराए गये। पर जन साधारण को मिलने में संकोच होता था। अत: वे सभी को विस्मित करते हुए 19/8 छक्कू खान सामा गली में आ गये।
उन्होंने वर्तमान बंगलादेश में जाकर किशोरगंज में स्वदेशी आंदोलन प्रारंभ किया । वेश बन गया धोती और चादर। अब राष्ट्रीय विद्यालय से भी अलग होकर अग्निवर्षी पत्रिका व्वंदेमातरम्व् का प्रकाशन प्रारंभ किया।
इसी के साथ विप्लवी युवकों को चुन-चुनकर संगठन प्रारंभ हुआ। चन्द्रनगर के अज्ञात अध्यापक ने वंदेमातरम् को पत्र लिखा था। श्री अरविंद ने उसे खोज निकाला और वंदेमारतम् के सम्पादकीय विभाग में रख लिया। यही बने प्रख्यात विप्लवी उपेन्द्र बंद्योपाध्याय। ऐसे विप्लवी गण श्री अरविंद के संस्पर्श में आकर भारत माता के लिए प्राण न्योछावर कर सके। उपेन्द्र श्री अरविंद द्वारा संस्थापित विप्लवी प्रशिक्षण केन्द्र मानिकतल्ला बगीचे में शस्त्र और शास्त्र के प्रशिक्षक भी बने थे।
क्रांतिकारियों के हाथ में पिस्तौल के साथ बम आ जाने से ब्रिाटिश सरकार दहल उठी थी। एक दिन तड़के पुलिस अधीक्षक क्रेगन ने श्री अरविंद के घर पर छापा मारा। श्री अरविंद चटाई पर लेटे थे। पहले तो क्रेगन को यकीन ही नहीं हुआ कि 18 वर्ष लंदन में पढ़ा कोई व्यक्ति ऐसे रह सकता है। पर साथ के मजिस्ट्रेट ने जब मेज पर लैटिन और ग्रीक के शब्दकोष देखे तो उन्होंने उनकी कमर में बंधी रस्सी को खोलने का हुक्म दे दिया था।
अलीपुर बम केस: फाँसी  के अभियुक्तों के लिए बनी कोठरी में श्री अरविंद के साथ दो कम्बल और एक तसला था। जिससे वे स्नान करते, पानी पीते और उसी में दाल लेकर रोटी डुबाने की कोशिश करते तो वह दरवेश की तरह नाचने लगता था। श्री अरविंद के अनुसार तसला यदि जीवित होता तो ब्रिाटिश शासन का परम आज्ञाकारी आईसीएस अधिकारी हुआ होता।
उनकी योग साधना तो चल ही रही थी। जेल में ही उन्हें श्रीकृष्ण के दर्शन हुए और आदेश मिला कि राजनीति छोड़ दो। तब तक श्री अरविंद भी यही समझते थे कि वे समाज के नेता हैं और स्वतंत्रता संग्राम में उनके बिना काम नीं चल सकता है। पर श्रीकृष्ण ने कहा व्मैं तुम्हें जिस कार्य के लिए जेल में लाया हूँ उस कार्य की ओर मुड़ो। जब तुम जेल से छूटो तो याद रखना...कभी डरना मत, हिचकिचाना मत। मैं इस देश और इसके उत्थान में हूँ। मैं वासुदेव हूँ। मैं नारायण हूँ।
श्री अरविंद को सर्वत्र नारायण दिखाई देने लगे। उन्होंने देखा कि न्यायाधीश, वकील, वृक्ष, सर्वत्र नारायण हैं। उनके वकील थे देशबंधु चितरंजन दास। उन्होंने बड़ी कवित्वमयी भाषा में बहस की। उन्हें राष्ट्रवाद का उद्गाता, मानवता का प्रेमी और भविष्य का मंत्रद्रष्टा बताया। पर सभी को आश्चर्य में डालते हुए वे छूट गये। इधर बैरिस्टर चितरंजन दास के घर का असबाब तक बिक गया।
9 मई 1909 को जब वे जेल से छूटे तो उनके साथ छूटे सभी क्रांतिकारियों को चितरंजन दास के घर ले जाया गया। सभी ने जेल दुर्लभ स्नान किया। भोजन में तरह-तरह के व्यंजन परोसे गये।
श्री अरविंद ने गरीबी का वरण नहीं किया था। उनका जीवन गीता में वर्णित समबुद्धि का प्रतिफल था। स्वदेशी आंदोलन की आर्थिक चोट से बंगाल का विभाजन तो स्थगित हो गया था पर स्वाधीनता के लिए सशस्त्र क्रांति को ही वे श्रेयस्कर मानते थे। उत्तरपाड़ा की सनातन धर्म रक्षिणी सभा के कार्यकारी सचिव अमरेन्द्र चट्टोपाध्याय ने जब क्रांति दीक्षा लेनी चाही तो उन्हें श्री अरविंद के पास ले जाया गया। अमरेन्द्र ने कल्पना के विपरीत देखा कि लंदन में पले-बढ़े श्री अरविंद आधी धोती ओढ़े बैठे हैं। उन्होंने पूछा कि व्स्वाधीनता के लिए सर्वस्व त्याग का संकल्प है क्या? अमरेन्द्र ने उत्तर दिया था कि व्जितना बाकी था वह आज आपको देखकर पूरा हो गया।
अपने 15 अगस्त 1947 के संदेश में श्री अरविंद ने विश्वास प्रगट किया था कि चाहे जिस मार्ग से हो, चाहे जिस उपाय से हो भारत का विभाजन दूर होना चाहिए और होगा।
(महर्षि अरविंद की समाधि मुंबई के पास संजान स्टेशन से मात्र 8 किलोमीटर दूर स्थित नारगोल गाँव में भी है। इसी नारगोल गाँव में सबसे पहेल पारसियों का आगमन हुआ था। नारगोल में ओशो ने भी अपने जीवनकाल में इसी समाधि परिसिर में कई ध्यान शिविरों का आयोजन किया था। )
साभार-साप्ताहिक –पाञ्चजन्य से

Friday, August 05, 2011

Lectures by Saikat Sen in Noida


Noida Management Association and Noida Chapter of NIRC of ICSI Jointly Organizes An Evening Lecture on “Management by Consciousness” By Prof. Saikat Sen, Director, SAFIM  Date - 10th August 2011 (Wednesday) Time - 06:30 PM onwards Venue - NMA House, C-20/6A, Opp. JSS College, Sector-62, Noida-201306
Two-days Workshop On Harvesting Values SHAPING VALUES IN BUSINESS at NTPC Limited (A Government of India Enterprise) A Power Management Institute Plot No.5-14, Sector 16-A, Noida - 201301, U.P. Dates: 11th& 12th August 2011 Time: 9:30 to 5:30 Participants: Senior and Middle Managers of NTPC Conducted by SAFIM - Sri Aurobindo Foundations for Integral Management, Sri Aurobindo Society, Puducherry
A Presentation on “Consciousness and Business Management” by Prof. Saikat Sen on 13th Aug, 2011 Time 14:30 – 16:00 hrs at The Jaipuria Institute of Management A – 32 A, Sector 62, Noida - 201309

Thursday, December 30, 2010

श्रीअरविन्द के मार्ग का चयन करना चाहिए

युग द्रष्टा महर्षि अरविन्द 
हनुमान सरावगी 
महर्षि अरविन्द एक चैतन्य और शाश्वत विचार धारा के प्रवर्तक केरूप में हमारे बीच विद्यमान हैं. आवश्यकता है उस विचारधारा को अंगीकार करने की, किन्तु हम अपनी परिधि में अनेक महत्वपूर्ण बिन्दुओं को सर्वदा अनदेखा कर जाते हैं, या समझ कर भी हम सहज मार्ग अपनाने का प्रयास करते हैं. हम कड़ा परिश्रम कर ऊंचाई की और बढ़ना नहीं चाहते हैं, जिसके परिणाम स्वरुप हम सत्य,प्रेम, निष्ठा या जीवन के उन मूल्यों को पा नहीं पाते जो हमारी परिधि में उपलब्ध हैं. हमें अपना जीवन सहज और कर्मप्रधान बनाने के लिए श्री अरविन्द के मार्ग का चयन करना चाहिए, क्योंकि तात्कालिक या तत्क्षण लाभ के प्रति मोह विश्व में विभेद और घृणा पैदा कर रहा है. यह तथ्य महर्षि अरविन्द ने कई बार अपने व्याख्यानों में रखा है और वह राह दिखलाने की कोशिश की है, जो सहज तो नहीं है किन्तु जब मंजिल मिल जाती है, तब शाश्वत आनंद का सागर ह्रदय में लहराता है. वह सुख की पूंजी नश्वर धन से अधिक आत्मतुष्टि देती है. 
हम कह सकते हैं कि महर्षि अरविन्द की बतायी राह वह राह है, जो आदमी के जीवन को सार्थक बनाती है औरउसे सद्कर्म का सन्देश देती है. 
महर्षि ने कर्म के दोनों रूपों को भी स्पष्ट किया है. सद्कर्म औरदुष्कर्म को परिभाषित कर बहुत साड़ी द्विविधाओं से समाज को मुक्ति दिलाने का मार्ग बतलाया है. सच बोलना शाश्वत धर्म है. लेकिन सच बोलने की भी प्रक्रिया है. कौन सा सच किसके सामने कब बोलना चाहिए, यह हम तभी अनुभव कर सकते हैं, जब हम वेश्लेषण करने की क्षमता रखते हैं. गलत स्थान या गलत समय पर बोला गया सत्य भी दुष्कर्म या पाप का करण बन सकता है. इसी प्रकार झूठ बोलना सदा पाप होता है, लेकिन यह भी आवश्यकता पड़ने पर सद्कर्म या पूनी कर्म को प्रेरित कर सकता है. गीता में श्री कृष्ण ने युधिष्ठिर से अश्वत्थामा के मरे जाने की झूठी जानकारी द्रोणाचार्य को दिलवाकर, सत्य और धर्म की विजय को सुनिश्चित किया. महर्षि अरविन्द के दर्शन का अध्ययन और ज्ञान प्राप्त कर सद्कर्म की पहचान की जा सकती है.
महर्षि अरविन्द व्यक्ति को व्यावहारिक संवेदनशीलता से पुष्ट करना चाहते थे. एक बार महर्षि ने प्रश्न किया था," आदमी इतना कुछ पा चुका है, और उसे क्या पाना है? " उन्होंने स्वयं उत्तर दिया," प्रेम.' वह जानते थे कि लोग प्रेम का स्वरुप स्वार्थ में निहित कर किसी से प्रेम जताते हैं. यह प्रेम, प्रेम नहीं होता है. स्वार्थ-सिद्धि का कर्णं बन जाता है. महर्षि ने प्रेम की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया है," प्रेम नैसर्गिक होता है और प्रेम से समाज में प्रेम बढ़ता है. प्रेम सदा सर्वहित में होता है. वह मनुष्यता के गुणोंऔर विशिष्टताओं को स्थापित करता है.
श्री अरविन्द ने अपनी एक कविता में कहा है," शैशव काल में शिशु ईश्वर के तुली होता है." एक बालक का माता से प्रेम, निच्छल हॉट है. उसकी चंचलता में भी आनन्द की सुगंध होती है. उसकी हठ लीला भी आनंद प्रदान करती है. वास्तिविकता में बालक, मां,ह्रदय, प्राण और आत्मा से नि:स्वार्थ होता है. लेकिन धीरे-धीरे वही बालक जब बड़ा होता है, उसके हर कदम स्वार्थ की ढलान पर चल पड़ते हैं, और अन्ततोगत्वा ईश्वर या ईश्वरीय गुणों या प्राकृतिक गुणों से दूर हट कर अपनी मुख्य धारा से कट जाता है. महर्षि का सन्देश है कि हर आदमी अनेकानेक जटिलताओं और दु:खों से घिर कर अपना जीवन स्वयं कष्टमय बना लेता है.
महर्षि ने शक्ति और सत्ता की व्याखा करते हुए कहा है कि जब कोई सत्ता युद्ध में जीत जाती है, तो वह उन सभी मानवीय पक्षों पर विचार नहीं करती है जहाँ वह हार चुकी होती है और अल्प्नी कमजोरियों की उपेक्षा कर जाती हैं. सत्ता या शक्ति दोनों के दो भेद हैं-शाश्वत सत्ता और भौतिक सत्ता एवं शाश्वत शक्ति और भौतिक शक्ति. सत्य,प्रेम,स्नेह, सद्ब्याव्हार की सत्ता शाश्वत होती है और स्वार्थ, हिंसी, लिप्सा, लाभ की सत्ता सदैव भौतिक होती है, जो असंतोष एवम दुःख को जन्म देती है.
महर्षि ने कहा है कि जब मां का जानवर धर्म की लगाम से नियंत्रित हो कर समाज में आगे बढ़ता है, तो वह कृष रूप हो जाता है. सार्वभौमिक हो जाटा है. 
महारसी अरविन्द का सन्देश है कि लोग अपनी मंजिल और उस तक पहुँचने की राह सत्य, धर्म, मानवीय आचरण और विवेक से निश्चित करे औरहर कदम पर अपनी आप्मा को जागृत रखे. जिसकी आत्मा अलौकिक नहीं होगी, उसमे सही और गलत का निर्धारण करने की क्षमता नहीं हो सकती. आत्मा उसी की आलोकित होती है स्वार्थ से ऊपर उठ कर सद्कर्म करता है. मानव अपना प्रयास अपने तक संकुचित नहीं रखे. अपने समस्त प्रयास भूतकाल के अनुभव, वर्तमान की आवश्यकता और भविष्य में उनके प्रभव को देख कर करें, जिससे कि प्रयास सदैव सार्वभौम हो. मानव का आह्वान करते हुए महर्षि अरविन्द ने आनद से आनान्दित होने के लिए कहा है, जो स्थाई उपलब्धि है और इससे नैसर्गिक सुखों की अनुभूति होती है. महर्षि ने मानव-मानव में बढ़ते भेद और दूरियों को परखा और कहा है कि मानव का जन्म निश्चित कर्म के लिए होता है, अपने कर्म के माध्यम से अपनाव्यक्तित्त्व बनाने के लिए नहीं. व्यक्तित्व निर्माण की स्वार्थपरक प्रक्रिया ने ही मानव मानव के बीच विभेद पैदा किया है. 
महर्षि के विचारों से स्पष्ट है कि मानव का हर प्रयास "बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय" पर आधारित होना चाहिए. हर प्रयास समाज के हित में होना चाहिए. नि:स्वार्थ मानव के समाज में ही शाश्वत आन्नद का प्रवाह संभव है. ऐसे ही समाज में कृष्ण की बांसुरी की सुरीली तान सर्वदा अव्गूंजित हो सकती है. 
महर्षि ने कहा है, " छोटी राह से प्राप्त भौतिक सम्पदा सुख से अधिक दुःख देती है, जबकि शाश्वत सुख के लिए कठिन और लम्बी राह पर चलना होता है. जो सच्चा सुख चाहते हैं उनको उसी कठिन और लम्बी राह पर चलने की अनिवार्यता है. महर्षि अरविन्द का दिस्ब्य सन्देश है कि सद्कर्म की राह पर चलो और एक दिन कृष्ण के विराट स्वरुप में समाहित हो जाओ, अर्थात जिसकी ऊर्जा से यह शरीर कार्य करता है, मृत्यु के बाद उसी ऊर्जा के स्वामी से जा मिलता है. यह मिलन मात्र कर्म मार्ग से ही संभव है." Posted by hpsarawgiwrites

Talk by Dr. Archana Modi at Noida Branch

From sri aurobindo society noida branch sriaurobindosocietynoida@gmail.com to "Tusar N. Mohapatra" tusarnmohapatra@gmail.com date 28 December 2010 18:18 subject Schedule of Activities at Sri Aurobindo Society, Noida Branch in January, 2011.
Sir, Pranaam. We enclose Schedule of Activities at Sri Aurobindo Society, Noida Branch in January, 2011 with request to attend the same with your family members and friends.
Sri Aurobindo Society, Noida Branch's events/programmes can also be viewed at:- http://www.parichowk.com/events.aspx or 


Your kind presence with family members and friends in the following programms is also requested.

(a) New Year Meditation on Saturday, 1st January, 2011 from 9.30AM to 10AM.
(b) Talk by Dr. Archana Modi, Chairman, Sri Aurobindo Society, Mahoba Branch on 'Jeevan Mein Adhyatimikta Kaa Mahatav' on Thursday, 30th December, 2010 from 5PM to 6PM.
WISHING YOU ALL A VERY HAPPY NEW YEAR.
Let the birth of the New Year
be the new birth of our consciousness.
- The Mother
REGARDS.
In the service of The Mother,
Suresh Chand Gupta
Executive Secretary
Sri Aurobindo Society, Noida Branch
Sri Aurobindo Bhavan,
C-56/36, Sector-62, Noida-201301 (U.P.)
Tel:-0120-3263313, (M) 09818636362

Thursday, December 09, 2010

6th Anniversary of Sri Aurobindo Bhavan's dedication to public at Noida

From sriaurobindosociety noidabranch sriaurobindosocietynoida@gmail.com to "Tusar N. Mohapatra" tusarnmohapatra@gmail.com date 1 December 2010 13:35
SAS/NB/Prog/21/10                                                                                           30th November, 2010 INVITATION
Sub:    Meeting with Members to be addressed by Shri Vijay Poddar Ji, Chairman, Sri Aurobindo Society, Hindi Zone.

On the occasion of 6th Anniversary of ‘Sri Aurobindo Bhavan’s Dedication for Public’ at Noida, a meeting has been scheduled as per details given below: 

Day                                         : Saturday
Date & Time              : 11th December, 2010 – 5PM to 7PM
Venue                         : Sri Aurobindo Bhavan, C-56/36, Sector 62, Noida.

The Meeting will be addressed by Shri Vijay Poddar Ji, Chairman, Sri Aurobindo Society, Hindi Zone about the Society’s activities viz-a-viz members participation therein.  After the address there will be an interactive session. The meeting will be followed by High Tea.                                  
All are requested to participate in the above programme with their family members and friends.

There is no greater pride and glory than to be  a perfect instrument of the Master
    -Sri Aurobindo

Suresh Chand Gupta
Executive Secretary
0120-3263313 

PLANNED ACTIVITIES FOR DECEMBER, 2010

Time
Days
Programme

7AM to 8AM            

MON. to SAT

Free Yogasan & Pranayam  by  Acharya V. N.  Pandey

9AM to 9.30AM

MON to SAT

‘Our Prayer’ & Meditation

9.30AM to 10.30AM

MON, WED, FRI

Yogasan & Pranayam by Ms Smiriti Batra
(For Ladies)

10AM to 11AM         

Every Sunday             

Collective Meditation; Spiritual Reading and  Bhajans

11AM to 01PM          
Every Saturday/
Sunday                   
Discussions on ‘GITA’ Led by Sh. Viswa Mohan Tiwari,
Air Vice Marshal (Retd.)

11AM to 01PM

Every Sunday

Free Consultation and Eye Check-up by Dr. P.S. Chauhan.

3.30 PM to
5.30 PM
MON to FRI
 Free Acupressure Treatment by Sh. G. P.  Shukla 


10AM to 11AM

5th Dec. ‘10
Sunday

Sri Aurobindo’s Mahasamadhi Day -
Meditation; Spiritual reading
5PM to 7PM
11th Dec. ‘10
Saturday
6th Anniversary of Dedication for Public – Sri Aurobindo Bhavan:  Meeting with Members to be addressed by Shri Vijay Poddar Ji, Chairman, Sri Aurobindo Society, Hindi Zone about Society’s Activities viz-a-viz Members participation therein followed by interactive session.

10AM to 5PM

18th and 19th Dec. 2010
Saturday & Sunday

UP & Uttrakhand’s State Committee Meeting; Sri Aurobindo Society Hindi Zone Meeting & Press Meet/Conference
6PM to 7PM
25th Dec.’10
Saturday
Bhajan / Sangeet / CD - The Mother on Sri Aurobindo

Note:
 i)   Meditation Hall opens everyday from 7AM to 7PM
ii)   Library is open every day from 9AM to 6PM
iii)   SABDA publications and products from Auroshikha & Cottage Industry,                  Pondicherry are available at the Branch  everyday from 10AM to 6PM.

S.C. Gupta
Executive Secretary
Phone: 0120-3263313

Thursday, November 18, 2010

साधना एवं सिद्धि: SamayLive - 18 Nov 2010

साधना एवं सिद्धि  महर्षि अरविन्द ने अपनी पूर्ण योग रूपी सर्वांगपूर्ण पद्धति में बताया है कि जगत् और जीवन से बाहर निकलकर स्वर्ग या निर्वाण योग का लक्ष्य नहीं है, जीवन एवं जगत् को परिवर्तित करना ही पूर्ण योग है। पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
साधक निम्न प्रकृति की सभी क्रियाओं, विभिन्न द्वन्द्वों, अविद्या के आक्रमण और अपने अज्ञान को इस दृष्टि से देखता है और उसे दूर करने हेतु प्रयत्न करता है। इस शुद्धि के फलस्वरूप मन की शांति, चित्त की स्थिरता, प्राण की एकाग्रता, ह्मदय की तन्मयता और विकारों से निष्कृति प्राप्त होती है, जो पूर्ण योग की आधार भूमि है। ऐसे शुद्ध, शांत, चंचल और नीरव आधार पर ही तो भागवत आनन्द, प्रेम, ज्ञान का अवरोहण संभव है। सर्वांगपूर्ण योग पद्धति के चार प्रमुख अंग हैं- शुद्धि, मुक्ति, सिद्धि और भुक्ति। साधना की प्रथम अनिवार्य आवश्यकता है-शुद्धि। इसका क्षेत्र अति विशाल है। यह अंत: और बाह्य दोनों के परिशोधन का प्रयास है। इससे जीवन को एक काल तक परिवर्तित भी कर लेते हैं। पूर्ण योग में शरीर ही नहीं मन, प्राण, अंत:करण अर्थात् सत्ता के समस्त अंगों का परिष्कार होता है। शुद्धि की शुरुआत होती है।

इसका दूसरा अंग है- मुक्ति। इसका तात्पर्य कहीं अन्य लोक-लोकान्तर में न पलायन है, न ही समस्त स्थूल क्रिया-कलापों अथवा प्रकृतिगत चेष्टाओं का परित्याग कर निर्वाण प्राप्त करना। यह आत्मा का, विभिन्न वासनाओं, शरीर बंधन एवं आकर्षणों से पहले हो जाना है। इसके दो पद हैं-त्याग और ग्रहण। इसमें एक है निषेधात्मक और दूसरा विधेयात्मक। प्रथम का अर्थ है, सत्ता की निम्न प्रकृति के बंधनों, आकर्षणों से छुटकारा। द्वितीय भावनात्मक पक्ष का तात्पर्य है- उच्च स्तर आध्यात्मिक सत्ता में समाहित होना। संसार भगवान् का लीला क्षेत्र है। इसका पलायन करके कोई भी यथार्थ में इस योग का योगी नहीं बन सकता है।
वासना और अहंता ही हैं अज्ञान की पिटारियां। इनसे ही छुटकारा पाना है। दूसरे शब्दों में, भगवान् के समान बनना ही मुक्ति का सम्पूर्ण एवं समग्र आशय है। शुद्धि एवं मुक्ति दोनों  'सिद्धि"  की पहले की अवस्थाएं हैं। पूर्णयोग में सिद्धि का अर्थ है भागवत् सत्ता की प्रकृति के साथ एकत्व की प्राप्ति। मायावादी सत्ता के सर्वोच्च सत्य निर्विकार निर्गुण एवं आत्म सचेतन ब्राहृ है। अतएवं आत्मा की शुद्ध, निर्विकार शान्ति एवं चेतनता में विकसित एकाकार होना ही उसकी सिद्धि है। सर्वांगपूर्ण योग में सिद्धि का तात्पर्य है-एक ऐसी दिव्य आत्मा और दिव्य कर्म को प्राप्त करना, जो विश्व में दिव्य संबंध एवं दिव्य कर्म का खुला क्षेत्र प्रदान करे। इसका समग्र अर्थ है- सम्पूर्ण प्रकृति को दिव्य बनाना तथा उसके अस्तित्व और कर्म की समस्त असत्य गुत्थियों का परित्याग।
भुक्ति का तात्पर्य श्री अरविन्द की दृष्टि में है- अनासक्त भाव से उपभोग। जीवन में दिव्य पूर्णता का अवतरण करना, सम्पूर्ण जीवन को आध्यात्मिक शक्ति का क्षेत्र मानकर दिव्य भोग करना ही भुक्ति का आंतरिक सार है। तभी सिद्धि संभव हो सकेगी, देव-मानव अतिमानव बन सकेगा। गायत्री तीर्थ शांतिकुंज, हरिद्वार

Monday, November 15, 2010

Talk by Dr. D.N. Dani at Sri Aurobindo Bhavan, Noida on 20th November

From sriaurobindosociety noidabranch sriaurobindosocietynoida@gmail.com to "Tusar N. Mohapatra" tusarnmohapatra@gmail.com date 15 November 2010 14:24 subject A talk on 'INTEGRAL EDUCATION' by Dr. D.N. Dani, Chairman, Sri Aurobindo Society, Udaipur Centre.
Sir,
Sri Aurobindo Society, Noilda Branch is organizing a talk on 'Integral Education' by Dr. D.N. Dani, Chairman of Sri Aurobindo Society, Udaipur Centre on Saturday, 20th November, 2010.  Your kind presence in that alongwith family and friend is requested. REGARDS. In the service of The Mother, Suresh Chand Gupta
Executive Secretary
Sri Aurobindo Society, Noida Branch
Sri Aurobindo Bhavan,
C-56/36, Sector-62, Noida-201301 (U.P.)
Tel:-0120-3263313, (M) 09818636362

SAS/NB/Prog/RD/10  15th November, 2010 INVITATION Sub: Talk on ‘Integral Education’
Sri Aurobindo Soceity, Noida Branch is organizing a Talk on ‘INTEGRAL EDUCATION’ by Dr. D.N. Dani, Chairman, Sri Aurobindo Society, Udaipur Centre and former Vice-Principal, Vidyabhavan Shikshak Mahavidyalaya, Udaipur as per details given below:-
Day & Date:   Saturday, 20th November, 2010
Time:              5.30PM to 7.00PM
Place:              Sri Aurobindo Bhavan,                                                                         C-56/36, Sector 62,                                                                         Noida.                                     
All are requested to participate in the above programme  with family members and friends.

                                    ‘Sincerity is the key of the divine doors’
-         The Mother 

Suresh Chand Gupta
Executive Secretary
Phone: 0120-3263313    
PLANNED ACTIVITIES FOR NOVEMBER, 2010

Days
Programme

Time

MON. to SAT

Free Yogasan & Pranayam  by  Acharya V. N.  Pandey

7AM to 8AM            

MON to SAT

‘Our Prayer’ & Meditation

9AM to 9.30AM

MON, WED, FRI

Yogasan & Pranayam by Ms Smiriti Batra
(For Ladies)

9.30AM to 10.30AM

Every Sunday             

Collective Meditation; Spiritual Reading and  Bhajans


10AM to 11AM         

Every Saturday/
Sunday                      

Discussions on ‘GITA’ Led by Sh. Viswa Mohan Tiwari,
Air Vice Marshal (Retd.)


11AM to 01PM          

Every Sunday

Free Consultation and Eye Check-up by Dr. P.S. Chauhan.


11AM to 01PM

MON to FRI

Free Acupressure Treatment by Sh. G. P.  Shukla 


3.30 PM to
5.30 PM

17th Nov. ‘10
Wednesday

Mother’s Mahasamadhi Day -
Meditation

6PM to 6.30PM

20th Nov. ‘10
Saturday

Talk on ‘Integral Education’ by Dr. D.N. Dani, Chairman, Sri Aurobindo Society, Udaipur Centre and former Vice-Principal, Vidya Bhawan Shikshak Mahavidyalaya, Udaipur

5.30PM to 7PM

24th Nov. ‘10
Wednesday

Darshan Day – Siddhi Day
CD on  ‘Sri Aurobindo – A Life Divine’ &
Meditation

6PM to 7PM

27th Nov. ‘10
Saturday

Bhajan / Sangeet / CD-Bhagwat Muharat

6PM to 7PM

Note:
 i)   Meditation Hall opens everyday from 7AM to 7PM
ii)   Spiritual Library is open every day from 9AM to 6PM
iii)   SABDA publications and products from Auroshikha & Cottage Industry,                  Pondicherry are available at the Branch  everyday from 10AM to 6PM.

S.C. Gupta
Executive Secretary